बुझ गया उर्दू सहाफ़त का एक और चराग़, देवबन्द में उर्दू पत्रकारिता के लिए हमेशा याद किए जायेंगे रिज़वान सलमानी।

सहारनपुर: (शिब्ली रामपुरी) मौजूदा दौर में उर्दू पत्रकारिता करना बड़ा कठिन कार्य है इसकी वजह यह है कि उर्दू के नाम पर जितना शोर शराबा होता है अफ़सोस की बात है कि ज़मीनी स्तर पर उर्दू के लिए इतना काम नहीं हो पाता है और हो भी नहीं रहा है. जहां तक उर्दू पत्रकारिता की बात है तो हक़ीक़त में उर्दू पत्रकार उर्दू के सच्चे खिदमतगार होते हैं. आज के वक्त की यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आज उर्दू जहां सरकारी स्तर पर अनदेखी का शिकार है वहीं जिन लोगों पर उर्दू को बढ़ावा देने की उर्दू के लिए कुछ करने की ज़िम्मेदारी है उन्होंने भी उर्दू से अपना रिश्ता तोड़ रखा है।

देवबन्द में उर्दू पत्रकारिता में रिज़वान सलमानी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था. नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक हमारा समाज में वो पत्रकार थे और काफ़ी अच्छा लिखते थे. रिज़वान ने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा उर्दू की खिदमत में गुज़ारा और अंतिम वक़्त तक वो उर्दू की सच्चे दिल से बतौर पत्रकार खिदमत अंजाम देते रहे.उन्होंने जिस तरह से पत्रकारिता की उसके लिए वो हमेशा याद किए जाएंगे. रिजवान सलमानी को उर्दू के सच्चे खिदमतगार के तौर पर हमेशा याद रखा जाएगा।

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