उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता- भाजपा को मिलेगा लोकसभा चुनाव में राजनीतिक लाभ?

शिब्ली रामपुरी
उत्तराखंड विधानसभा के पटल पर समान नागरिक संहिता बिल पेश किए जाने के बाद सीएम पुष्कर धामी ने जनता से किया वह वायदा पूरा कर दिया है जो उन्होंने चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद सत्ता में आने के बाद किया था. यूसीसी यानि समान नागरिक संहिता बिल पेश किए जाने के बाद जहां भाजपा ने इसका स्वागत किया है तो वहीं समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं और कांग्रेस ने इस पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और एमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी तो इस बिल का काफी पहले से ही विरोध करते आ रहे हैं।

कई तरह के विरोध और हिमायत के बाद समान नागरिक संहिता लागू होने के मामले में आजादी के बाद उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनने जा रहा है वैसे तो गोवा में भी यूसीसी लागू है पुर्तगाली शासन के दिनों से गोवा में समान नागरिक संहिता लागू है. संविधान में गोवा को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है. उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का जो बिल विधानसभा पटल पर पेश किया गया है उसमें शादी से लेकर लिव इन रिलेशन तक पर सख्त नियम बनाए गए हैं और इस विधेयक में कुछ विशेष प्रावधान भी किए गए हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी समान नागरिक संहिता पर ऐतराज है. बोर्ड के मुताबिक अगर यह लागू होता है तो इससे मुसलमानों के कई अधिकार समाप्त हो जाएंगे।

उत्तराखंड की तरह देश के कई और राज्य हैं जो अपने यहां समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते हैं. समान नागरिक संहिता संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आता है इसी अनुच्छेद का हवाला देकर देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग उठाई जा रही है. जो लोग इसकी हिमायत में हैं उनकी नजर में समान नागरिक संहिता लागू होने से जहां जनसंख्या वृद्धि रोकने में मदद मिलेगी तो वहीं कई और समस्याओं का भी इससे समाधान होगा।

समान नागरिक संहिता के मामले में यदि राजनीतिक पहलू की बात करें तो क्या इससे लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कोई फायदा मिलेगा? क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति में यूसीसी का मुद्दा हमेशा से प्राथमिकता में शामिल रहा है. समान नागरिक संहिता की हिमायत में कुछ वक्त पहले पीएम मोदी ने भोपाल में एक जनसभा के दौरान कहा भी था कि एक परिवार में दो कानून कैसे चलेंगे।

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